Lord Mahavir Quotes

Lord Mahavir Quotes – भगवान महावीर के अनमोल वचन

Dharm Sansar Quotes

भगवान महावीर, जिन्हें वर्धमान के नाम से भी जाना जाता है, जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर थे। वे 24 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। भगवान महावीर के उपदेश आज की दुनिया में बहुत अधिक प्रासंगिक हैं। आइए हम कुछ भगवान महावीर के कुछ अनमोल वचन ( Lord Mahavir Quotes ) देखते हैं , जो आज के जीवन में काफी मायने रखते हैं।

भगवान महावीर का जन्म 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभिक भाग में , वैशाली (आधुनिक बिहार में), भारत में एक शाही क्षत्रिय जैन परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम त्रिशला और पिता का नाम सिद्धार्थ था।

भगवान महावीर जैन दर्शन के अनुसार अंतिम जैन तीर्थंकर थे।

Who is a Tirthankara – तीर्थंकर किन्हे कहते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर (अरिहंत, जिनेन्द्र) उन २४ जैन गुरुओं के लिए प्रयोग किया जाता है, जिन्होंने स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान (केवल ज्ञान) प्राप्त किया और संसार को सदमार्ग पे चलने का रास्ता दिखाया। भगवान महावीर २४ वें तीर्थंकर हैं।

Lord Mahavir Quotes hindi- भगवान महावीर के अनमोल वचन

सो चलिए दोस्तों हम भगवान महावीर के कुछ अनमोल वचन जानते हैं जो हमारे जीवन को सफल बनाने के लिए अनमोल हैं।

Lord Mahavir Quotes

शांति और आत्म-नियंत्रण अहिंसा का सबसे बड़ा स्वरुप है।


प्रत्येक आत्मा अपने आप में सर्वज्ञ और आनंदमय है। आनंद बाहर से नहीं आता है


सुख में और दुःख में, आनंद में और कष्ट में, हमें हर जीव के प्रति वैसी ही भावना रखनी चाहिए जैसा की हम अपने प्रति रखते हैं।


किसी भी प्राणी या जीवित प्राणी को घायल न करें, दुर्व्यवहार, अत्याचार, दासता, अपमान, पीड़ा, यातना या हत्या न करें। – Lord Mahavir Quotes


सभी आत्माएं समान और एक जैसी हैं और सभी में समान प्रकृति और समान गुण हैं।


ईमानदारी से, एक आदमी शारीरिक, मानसिक और सामंजस्यपूर्ण प्रवृत्ति हासिल करता है।


सभी मेरे दोस्त हैं। मेरा कोई दुश्मन नहीं है।


किसी को उसकी आजीविका से वंचित न करें। यह एक पाप है।


सभी जीवों के प्रति सम्मान अहिंसा है


जीव हत्या ना करें, किसी को ठेस न पहुचांयें! अहिंसा ही सबसे महान धर्म है।


एक व्यक्ति जलते हुए वन में एक ऊँचे वृक्ष पर बैठा है। वह सभी जीवित प्राणियों को मरते हुए और तबाह होते हुए देखता है, लेकिन वह यह नहीं समझ पाता है कि जल्द ही उसकी भी वही दशा होने वाली है; मूर्ख है वह आदमी।


यदि आप किसी अछि आदत को अपनाना चाहते हैं तो पूरे दिल से उसे करने की कोशिश करें। और तब तक करते रहें जब तक ये आपके आदत में शामिल न हो जाये। जब तक यह आपके चरित्र का हिंस्सा न बन जाये उसे करते रहें।


आत्मा आध्यात्मिक अनुशासन का केंद्र बिंदु है।- Lord Mahavir Quotes


किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती अपने वास्तविक रूप को ना पहचानना है, और यह केवल स्वयं को जानकर ही ठीक की जा सकती है।


भोजन आत्म-नियंत्रण के लिए सबसे बड़ी बाधा है, यह अकर्मण्यता को जन्म देता है।


आत्मा अकेले आती है अकेले चली जाती है, न ही कोई उसका साथ देता है और न ही कोई उसका मित्र बनता है।


जरूरत न होने पर जमा न करें। आपके हाथों में धन की अधिकता समाज के लिए है, और आप उस के ट्रस्टी हैं।


जीवों के प्रति दया रखो, घृणा विनाश की ओर ले जाती है।


आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध, घमंड , लालच, आसक्ति और घृणा।


किसी भी जीव को नुकसान न पहुचाएं, गाली ना दें, अत्याचार न करें, उसे दास न बनायें, उसका अपमान ना करें, उसे सताएं अथवा प्रताड़ित न करें तथा उसकी हत्या ना करें।


स्वयं पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है।


अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है।


सभी मनुष्य अपनी ही गलतियों की वजह से दुखी होते हैं, और वे खुद अपनी गलतियाँ सुधार कर प्रसन्न हो सकते हैं।


स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मनों से क्या लड़ना? जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेंगे उन्हें आनंद की प्राप्ति होगी


जो पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और वनस्पति के अस्तित्व की उपेक्षा या अवहेलना करता है, वह अपने अस्तित्व की अवहेलना करता है।


आत्म-नियंत्रण का अभ्यास शुरू करे, उपवास से शुरू करें।


जियो और दूसरों को जीने दो; किसी को चोट न पहुंचे जीवन सभी जीवों को प्रिय है।


पर्यावरण का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि आप एकमात्र तत्व नहीं हैं।


क्रोध अधिक क्रोध करता है, और क्षमा और प्रेम अधिक क्षमा और प्रेम की ओर ले जाता है


सभी सांस लेने वाले , मौजूदा, जीवित और संवेदनशील प्राणियों को न तो मारना चाहिए, न ही हिंसा के साथ व्यवहार करना चाहिए, न ही दुर्व्यवहार करना चाहिए, न ही पीड़ा देना चाहिए। यह पाप है।


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आसक्ति और परिग्रह कर्म का मूल कारण है, और कर्म की उत्पत्ति मोह से होती है। कर्म जन्म और मृत्यु का मूल कारण है, और इन्हें दुख का स्रोत कहा जाता है। कोई भी अपने स्वयं के पिछले कर्म के प्रभाव से बच नहीं सकता है।


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Sanjeev

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